पडौस धर्म को रोंदते हुए
शिष्टता की न्यूनतम हदों को भी किनारे कर
इतिहास की पुनरावृत्ति की कुचेष्टा में
फिर फन उठाने लगा है
वो विश्वासघाती व विस्तारवादी ड्रैगन
जी हाँ , वही
जिसने हिंदी - चीनी भाई भाई के मधुर नारों की आड़ में
६२ में हमारी ही पीठ में चुरा घोंपा
और उसी छद्म जीत के नशे में आज तक है उन्मत्त ...
वही
जिसने तिब्बत पर अवैध कब्जा कर
हिटलर की मानिंद प्रताडित किया है मानवता को ,
अपनी ही धरती से निर्वासित किया है लाखों तिब्बतियों को
अपमानित किया है देव तुल्य दलाई लामा को ....
वही
जिसने नेपाल में माओवादी आतंक को हवा देकर
और फिर अपनी कठपुतली सरकार बनवाकर
चली है शकुनि वाली अति कुटिल चाल
करने को भारत का हाल बेहाल .....
वही
जिसने कब्जा रखा है
हमारे कश्मीर का बहुत बड़ा हिस्सा
वही
जो कभी अरुणाचल को अपना हिस्सा बताता है
तो कभी सिक्किम पर अपना अधिकार जताता है
तो कभी हमारी सीमाओं में घुसकर
चट्टानों पर लाल चीन लिख कर भाग जाता है
ये ठीक है की
हम बुद्ध धर्म के हैं अनुयायी, हम शान्ति मन्त्र के उद्गाता
हम जग विख्यात अहिंसक हैं, हिंसा से अपना क्या नाता
किन्तु मेरी धरती पर गर कोई भी संकट आएगा
तो स्मरण रखो अशोक फिर से कर में तलवार उठाएगा
इसलिए मत छुओ आग को
मत मजबूर करो हमको, हमारे जवानों को
क्योंकि
हम वो हैं जो
राम बनकर साधन व शक्ति संपन्न रावण तक को परास्त किया करते हैं
हम वो है जो
शिवराज बनकर विराट दिखने वाले अफजल खान की भी अंतडियां खींच लिया करते हैं
हम वो है जो
राणा सांगा सम अस्सी घाव खाकर भी
शत्रु को रोंद दिया करते हैं
हम वो हैं जो
कभी सूरज न डूबने वाले ब्रिटिश शासन की भी
चूलें हिला दिया करते हैं
हम वो है जो
धींगरा बनकर
कर्जन वायली के घर में ही उसकी प्राण-लीला लील लिया करते हैं
हर भारतवासी को प्रिय है अपने राष्ट्र की सीमाओ की सुरक्षा
इसलिए हे नादान पडोसी मत लो हमारे धीरज की परीक्षा ...
मत लो हमारे धीरज की परीक्षा ...
मत लो हमारे धीरज की परीक्षा ....
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