Friday, October 16, 2009

शुभ दीपावली !

जगमग दीपों की पंक्ति का हो त्योहार दीवाली
हर तरफ ख़ुशी व रौनक का हो उपहार दीवाली
रूठों को भी मना लेने की हो मनुहार दीवाली
अपने स्नेह भरे दिल का हो विस्तार दीवाली
सुख-समृद्धि की आपके लिए हो भरमार दीवाली
शुभ हो - शुभ हो - शुभ हो , आपको बारम्बार दीवाली

Wednesday, October 14, 2009

चाँद की तलाश

मद्धम सी बहती हवा थी
तारों की चमक जवां थी
ऐसे लम्बी गहन निशा में
चाँद अकेला भटक रहा था
तारों के बीच में से
अपना मार्ग तलाश रहा था
और
तलाश रहा था ऐसे किसी को
जिसे वो अपना कह सके
दोस्ती के प्रवाह में बह सके
मगर बेचारा अनभिज्ञ था
नहीं जानता था की
सच्चे दोस्त
नुमाइश के लिए नहीं होते
वो हर पल तुम्हारे साथ रहते हैं
ठीक उसी तरह
जैसे खुशबू गुलाब से जुदा नहीं होती
उनके हाथ हमेशा तैयार होते हैं
तुम्हारे स्वागत को
आलिंगन को
उनका संबल हमें देता है
आत्मविश्वास
हर कठिनाई में खडा होने का
उनसे मिलना
हमारे चेहरे की सुन्दरता पर
चार चाँद लगा देता है
हमारे जीवन को संतोष का
उपहार ला देता है
मगर जिस तरह
किताब खोले बगैर
सिर्फ उसको देखने भर से
पढ़ी नहीं जाती
ठीक उसी तरह
तुम उसी दोस्त को दूर समझकर
याद करते हो
आंसू बहाते हो
जो हमेशा तुम्हारे सर्वाधिक करीब है
परन्तु कौन समझाए नादान चाँद को
कि उसे मिल सकता है जल्द ही
ऐसा साथी, ऐसा हमसफ़र
पर रात भर भटकना बंद करे वो
तभी दीदार होगा चांदनी का
जो उसके बेहद करीब है
बेहद करीब ...

Wednesday, October 7, 2009

क्या यह कम है ?

इस दगाबाज जमाने में
जहाँ मैं और सिर्फ मैं की आवाज गूंजती है
वहां आज भी हम मैं और तुम नहीं हैं
आज भी हम हम हैं
क्या यह कम है ....................

जहाँ लोग अपना दर्द जबरन
दूसरों पर उडेलने की नित नई चाल खोजते हैं
वहां आज भी एक दूसरे के गम को
अपने सर ओढ़ने की शिद्दत में हम हैं
क्या यह कम है ....................

जहाँ चिराग लेकर ढूँढने से भी
प्रेरणा दे सके वो बाती नहीं मिलती
वहां आज भी एक दूसरे के लिए
प्रेरणापुंज स्वरुप हम हैं
क्या यह कम है ....................

जहाँ हल्की से ऊँचाई पर पहुँचते ही
गिराने वालों की लम्बी कतारें लग जाती हैं
वहां आज भी एक दुसरे को बुलंदियों पर
देखने को आतुर हम हैं
क्या यह कम है ....................

जहाँ उम्मीदों के बचे खुचे
दरार वाले दीये तक मिटाने के
षड़यंत्र निरंतर होते हैं
वहां आज भी एक दूसरे की जीवन राह में
सूरज बनने के इच्छुक हम हैं
क्या यह कम है ....................

और अंत में ....
इस कुटनीतिक दुनिया में
इस टेढी मंशा वाले सीधे समाज में
जहाँ इंसान इंसान का शत्रु होकर
हैवान बनता जा रहा है
अपने क्षुद्र स्वार्थो के चक्रव्यूह में
नित नए पाप करता जा रहा है
भगवान् इंसान के दिल का
हर रोज मरता जा रहा है
वहां आज भी भगवान् न सही
पर भगवान् जैसी किसी दुर्लभ चीज को
एक दूसरे में खोज रहे हम हैं
क्या यह कम है ....................
क्या यह कम है ....................

रक्षाबंधन

भारत प्यारा देश हमारा
लगता पर्वों की शोभा से न्यारा
इन पर्वों की ज्योति से जगती
नई स्फूर्ति, नया उजियारा
राखी के नाजुक धागों में
समा जाये यह अपनत्व हमारा
छोड़ भूत के विद्वेष वैर को
भारत समरस होता सारा
महिमा इन रक्षा सूत्रों की
है विख्यात इतिहासों में
बाँधी राखी शची ने रण में
ताकि विजय मिली प्रयासों में
मुगल हुमायूँ तक पिघल गया
पाकर राखी राजपूतानी की
चल पड़ा रक्षा को तब
लाज रखी महान निशानी की
गर न वो यूनानी राखी आती
जिसने पोरस को भी बाँध दिया
तो शायद होता नहीं सिकंदर
जिसको पुरु ने जीवन दान दिया
बांधे भगिनी राखी जब सबको
ले प्रण रक्षा का भाई तब तो
भारतीय संस्कृति का अनूठा बंधन
जो न अब तक समझ आया जग को
आज जरूरत है हम सबको
खुद को इस राखी में पिरोने की
संगठित होकर बनें विजयी
गयी बेला अब सोने की
आओ रक्षाबंधन पर बांध जायें
हम इस अटल प्राण में
"इदं न मम राष्ट्राय स्वाहा" हमेशा
रखेंगे स्मरण मन में

इक्कीसवी शताब्दी की चौखट पर

नव शताब्दी की देहरी पर, थकते गिरते पहुँच गए हैं
गत हताशों को ढोते-ढोते, सचमुच कुछ थक गए हैं
पर मत भूल रे भारती क्या खोया है , तूने इन स्वाधीन पांच दशकों में
क्यों उपलब्धियां भी धुलने लगी हैं , जन-जन के बहते अश्कों में
राष्ट्र विखण्डित शुचिता खंडित, खंडित हो रही आजादी भी
पाश्चात्य रंग में रंगे खुद हम , आमंत्रित कर रहे बर्बादी भी
प्रतिभा पलायित हो रही है, विदेशी आकर्षक पर -गोद में
भूल बैठे देश प्रेम के रस को , चंद सिक्कों के अंध प्रमोद में
राजनीति बनी क्यों व्यवसाय आज, व्यापारी क्यों लोलुप राजनेता हो गए
विदुर चाणक्य के वे राजनयिक आदर्श,न जाने आज कहाँ खो गए
शिक्षक शिक्षक है मात्र पोथियों के , चरित्र निर्माण तो भूल गए
धौम्य की सौम्यता आरुणि का गुरुमान, सब इस अर्थजाल में डूब गए
पर हमारा गौरवशाली भूत, पुनः पुनः हमें स्मरण कराता है
गिरते रहें हैं कई बार हम , पर संभालना भी हमें आता है
और गर इक बार उठ गयी भारती, तो त्रिवर्णी ध्वजा ही ऊपर होगी
इक्कीसवी शताब्दी की चौखट पर, अपनी यही पहली दस्तक होगी
अपनी यही पहली दस्तक होगी .......................................

(स्वाधीनता की स्वर्ण जयंती - 15 अगस्त 1997 पर रचित)

मंजिल

आंधियों से अटखेलियाँ फितरत में है जिनकी
किस्मत की नरगिस उन्ही के गुण गाती है
गिर-गिर कर भी थमने की जुस्तजू में है जो
राहें महज उन्ही को मंजर दिखाती हैं
कौन कहता ठोकरें हैं पस्त करती आदमी को
अरे ठोकरें तो इंसान को चलना सिखाती हैं
मंजिल तक का फासला मापना ही है आदत जिनकी
बस उन्हें ही कभी मंजिल नहीं मिल पाती है