आंधियों से अटखेलियाँ फितरत में है जिनकी
किस्मत की नरगिस उन्ही के गुण गाती है
गिर-गिर कर भी थमने की जुस्तजू में है जो
राहें महज उन्ही को मंजर दिखाती हैं
कौन कहता ठोकरें हैं पस्त करती आदमी को
अरे ठोकरें तो इंसान को चलना सिखाती हैं
मंजिल तक का फासला मापना ही है आदत जिनकी
बस उन्हें ही कभी मंजिल नहीं मिल पाती है
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