नव शताब्दी की देहरी पर, थकते गिरते पहुँच गए हैं
गत हताशों को ढोते-ढोते, सचमुच कुछ थक गए हैं
पर मत भूल रे भारती क्या खोया है , तूने इन स्वाधीन पांच दशकों में
क्यों उपलब्धियां भी धुलने लगी हैं , जन-जन के बहते अश्कों में
राष्ट्र विखण्डित शुचिता खंडित, खंडित हो रही आजादी भी
पाश्चात्य रंग में रंगे खुद हम , आमंत्रित कर रहे बर्बादी भी
प्रतिभा पलायित हो रही है, विदेशी आकर्षक पर -गोद में
भूल बैठे देश प्रेम के रस को , चंद सिक्कों के अंध प्रमोद में
राजनीति बनी क्यों व्यवसाय आज, व्यापारी क्यों लोलुप राजनेता हो गए
विदुर चाणक्य के वे राजनयिक आदर्श,न जाने आज कहाँ खो गए
शिक्षक शिक्षक है मात्र पोथियों के , चरित्र निर्माण तो भूल गए
धौम्य की सौम्यता आरुणि का गुरुमान, सब इस अर्थजाल में डूब गए
पर हमारा गौरवशाली भूत, पुनः पुनः हमें स्मरण कराता है
गिरते रहें हैं कई बार हम , पर संभालना भी हमें आता है
और गर इक बार उठ गयी भारती, तो त्रिवर्णी ध्वजा ही ऊपर होगी
इक्कीसवी शताब्दी की चौखट पर, अपनी यही पहली दस्तक होगी
अपनी यही पहली दस्तक होगी .......................................
(स्वाधीनता की स्वर्ण जयंती - 15 अगस्त 1997 पर रचित)
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kash desh ka yuva man aapki is marmahat karne wali kavita ke marm ko samjhkar achran kar le...desh ka bhagye ban jaye. aapke paryas ko sadhuvad.
ReplyDeleteApni sanskriti ko naa bhoole fir bhi agar duniya ki achhi baate apnaa le to fir kya baat hai
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