Wednesday, October 14, 2009

चाँद की तलाश

मद्धम सी बहती हवा थी
तारों की चमक जवां थी
ऐसे लम्बी गहन निशा में
चाँद अकेला भटक रहा था
तारों के बीच में से
अपना मार्ग तलाश रहा था
और
तलाश रहा था ऐसे किसी को
जिसे वो अपना कह सके
दोस्ती के प्रवाह में बह सके
मगर बेचारा अनभिज्ञ था
नहीं जानता था की
सच्चे दोस्त
नुमाइश के लिए नहीं होते
वो हर पल तुम्हारे साथ रहते हैं
ठीक उसी तरह
जैसे खुशबू गुलाब से जुदा नहीं होती
उनके हाथ हमेशा तैयार होते हैं
तुम्हारे स्वागत को
आलिंगन को
उनका संबल हमें देता है
आत्मविश्वास
हर कठिनाई में खडा होने का
उनसे मिलना
हमारे चेहरे की सुन्दरता पर
चार चाँद लगा देता है
हमारे जीवन को संतोष का
उपहार ला देता है
मगर जिस तरह
किताब खोले बगैर
सिर्फ उसको देखने भर से
पढ़ी नहीं जाती
ठीक उसी तरह
तुम उसी दोस्त को दूर समझकर
याद करते हो
आंसू बहाते हो
जो हमेशा तुम्हारे सर्वाधिक करीब है
परन्तु कौन समझाए नादान चाँद को
कि उसे मिल सकता है जल्द ही
ऐसा साथी, ऐसा हमसफ़र
पर रात भर भटकना बंद करे वो
तभी दीदार होगा चांदनी का
जो उसके बेहद करीब है
बेहद करीब ...

4 comments:

  1. Sundar vichaar, aapki sabhi rachnaao me aapne bahut khub vichar prakat kiye hai...
    if we like .. http://exploring-self.blogspot.com

    ReplyDelete
  2. भटकना बंद करे वो
    तभी दीदार होगा चांदनी का
    जो उसके बेहद करीब है
    sundar bhaav
    swagat aur shubhkamnayen

    ReplyDelete
  3. बहुत सुंदर रचना है आपकी दीपावली की शुभकामनायें

    ReplyDelete