इस दगाबाज जमाने में
जहाँ मैं और सिर्फ मैं की आवाज गूंजती है
वहां आज भी हम मैं और तुम नहीं हैं
आज भी हम हम हैं
क्या यह कम है ....................
जहाँ लोग अपना दर्द जबरन
दूसरों पर उडेलने की नित नई चाल खोजते हैं
वहां आज भी एक दूसरे के गम को
अपने सर ओढ़ने की शिद्दत में हम हैं
क्या यह कम है ....................
जहाँ चिराग लेकर ढूँढने से भी
प्रेरणा दे सके वो बाती नहीं मिलती
वहां आज भी एक दूसरे के लिए
प्रेरणापुंज स्वरुप हम हैं
क्या यह कम है ....................
जहाँ हल्की से ऊँचाई पर पहुँचते ही
गिराने वालों की लम्बी कतारें लग जाती हैं
वहां आज भी एक दुसरे को बुलंदियों पर
देखने को आतुर हम हैं
क्या यह कम है ....................
जहाँ उम्मीदों के बचे खुचे
दरार वाले दीये तक मिटाने के
षड़यंत्र निरंतर होते हैं
वहां आज भी एक दूसरे की जीवन राह में
सूरज बनने के इच्छुक हम हैं
क्या यह कम है ....................
और अंत में ....
इस कुटनीतिक दुनिया में
इस टेढी मंशा वाले सीधे समाज में
जहाँ इंसान इंसान का शत्रु होकर
हैवान बनता जा रहा है
अपने क्षुद्र स्वार्थो के चक्रव्यूह में
नित नए पाप करता जा रहा है
भगवान् इंसान के दिल का
हर रोज मरता जा रहा है
वहां आज भी भगवान् न सही
पर भगवान् जैसी किसी दुर्लभ चीज को
एक दूसरे में खोज रहे हम हैं
क्या यह कम है ....................
क्या यह कम है ....................
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Bahut badhiya pratapji------------Keep it up
ReplyDeleteMunna
kya baat hai,bahut sundar kavita hai....
ReplyDeletebadhaai :)
"इस दगाबाज जमाने में
जहाँ मैं और सिर्फ मैं की आवाज गूंजती है
वहां आज भी हम मैं और तुम नहीं हैं
आज भी हम हम हैं
क्या यह कम है"......ye panktiyan vishesh roop se pasand aayin.....
bahut badiya
ReplyDeletePratapp ji aap kavi bhi hain...ye jankar bahut achha lga aur kavita padhkar to dil garden garden ho gya.
ReplyDelete"भगवान् इंसान के दिल का
ReplyDeleteहर रोज मरता जा रहा है
वहां आज भी भगवान् न सही
पर भगवान् जैसी किसी दुर्लभ चीज को
एक दूसरे में खोज रहे हम हैं..."
मानवता की उपस्थिति को नकार पता नहीं कहाँ भगवान् को खोज रहे हैं.
आपके अच्छे लेखन के लिए बधाई.
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आपको दीपावली की शुभकानायें!!
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दिवाली में साम्य