मद्धम सी बहती हवा थी
तारों की चमक जवां थी
ऐसे लम्बी गहन निशा में
चाँद अकेला भटक रहा था
तारों के बीच में से
अपना मार्ग तलाश रहा था
और
तलाश रहा था ऐसे किसी को
जिसे वो अपना कह सके
दोस्ती के प्रवाह में बह सके
मगर बेचारा अनभिज्ञ था
नहीं जानता था की
सच्चे दोस्त
नुमाइश के लिए नहीं होते
वो हर पल तुम्हारे साथ रहते हैं
ठीक उसी तरह
जैसे खुशबू गुलाब से जुदा नहीं होती
उनके हाथ हमेशा तैयार होते हैं
तुम्हारे स्वागत को
आलिंगन को
उनका संबल हमें देता है
आत्मविश्वास
हर कठिनाई में खडा होने का
उनसे मिलना
हमारे चेहरे की सुन्दरता पर
चार चाँद लगा देता है
हमारे जीवन को संतोष का
उपहार ला देता है
मगर जिस तरह
किताब खोले बगैर
सिर्फ उसको देखने भर से
पढ़ी नहीं जाती
ठीक उसी तरह
तुम उसी दोस्त को दूर समझकर
याद करते हो
आंसू बहाते हो
जो हमेशा तुम्हारे सर्वाधिक करीब है
परन्तु कौन समझाए नादान चाँद को
कि उसे मिल सकता है जल्द ही
ऐसा साथी, ऐसा हमसफ़र
पर रात भर भटकना बंद करे वो
तभी दीदार होगा चांदनी का
जो उसके बेहद करीब है
बेहद करीब ...
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
Sundar vichaar, aapki sabhi rachnaao me aapne bahut khub vichar prakat kiye hai...
ReplyDeleteif we like .. http://exploring-self.blogspot.com
Bahut khub. sundar
ReplyDeleteभटकना बंद करे वो
ReplyDeleteतभी दीदार होगा चांदनी का
जो उसके बेहद करीब है
sundar bhaav
swagat aur shubhkamnayen
बहुत सुंदर रचना है आपकी दीपावली की शुभकामनायें
ReplyDelete